छीपाबड़ौद । विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान द्वारा संचालित आदर्श विद्या मंदिर केलखेड़ी छीपाबड़ौद में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जयंती 31 सजीव झांकियां बनाकर हर्षोल्लास से मनाई । विद्यालय की उत्सव एवं जयंती प्रमुख अंतिम गोठानिया ने जानकारी देते हुए बताया कि आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मांगीलाल मेघवाल सहायक अभियंता 132 केवी जी एस एस ग्रेड छीपाबड़ोद तथा विशिष्ट अतिथि दिलबर कौर सरपंच देवरिजोध ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सजीव झांकियों पर पुष्प वर्षा तथा मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया । मुख्य अतिथि मांगीलाल मेघवाल ने अपने उद्बोधन में बताया कि झांसी की रानी जिसने अपने शौर्य,पराक्रम एवं वीरता से अंग्रेजी शासन ही नहीं संपूर्ण विश्व को अचंभित किया । इनका जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ । इनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था तथा इन्हें प्यार से मनु कहते थे । इन्होंने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ ही शस्त्र की शिक्षा भी प्राप्त की । वीरता के गुण इन में बचपन से ही विद्यमान थे । इसी कारण यह तलवारबाजी करना,दुर्ग तोड़ना,सेना का नेतृत्व करना,युद्ध लड़ना जैसे खेल बचपन से ही खेलती आई है । इनका विवाह 14 वर्ष की अल्पायु में सन 1942 के अंतर्गत झांसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और इस प्रकार व झांसी की रानी बनी । इन्होंने 1851 में एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन 4 माह की अल्पायु में उसकी मृत्यु हो जाने के दुःख से राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बिगड़ गया और 1953 में उनका देहांत गया । कुछ समय बाद उन्होंने एक दत्तक पुत्र को गोद लिया जिसका नाम दामोदर राव रखा । लेकिन स्वयं की संतान न होने के कारण अंग्रेजों की हड़प नीति के चलते झांसी दुर्ग पर अंग्रेजों का शासन हो गया । लेकिन रानी ने हार नहीं मानी और 1857 की क्रांति में अपने शौर्य और पराक्रम से अंग्रेजों को दांतो तले अंगुली दबाने पर विवश करती रही तथा इस प्रकार लगातार संघर्ष जारी रखते हुए 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय नामक स्थान पर अंग्रेजी सेना से वीरता पूर्वक युद्ध करते हुए अपने आत्मसम्मान और चरित्र की रक्षा करती हुई वीरगति को प्राप्त हुई । रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुंदरता,चालाकी,दृढ़ता,शौर्य आदि के लिए तो उल्लेखनीय थी ही विद्रोही नेताओं के लिए सबसे अधिक खतरनाक भी थी । इस प्रकार झांसी की रानी 1857 की प्रमुख नायिका बनकर उभरी । विशिष्ट अतिथि दिलवर कोर ने अपने उद्बोधन में संदेश दिया है कि आज की बालिकाएं भी झांसी की रानी से कम नहीं है बस अपनी क्षमताओं को पहचाने और उसका उसका सदुपयोग अपने,समाज तथा देश के विकास को गति प्रदान करते हुए गौरवान्वित करने में लगाएं । जिस प्रकार झांसी की रानी ने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर देशभक्ति की मिसाल पेश की है इसी प्रकार हम भी समाज और राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में अपना अमूल्य योगदान देकर मिसाल बने और हमेशा अपने आत्मसम्मान सदचरित्र को सर्वोपरि रखते हुए उसकी रक्षा के लिए आत्मनिर्भर बने । कार्यक्रम में अतिथि परिचय प्रधानाचार्य हरिसिंह गोचर ने स्वागत वरिष्ठ आचार्य कोमल वैष्णव व मनीषा महावर ने तथा आभार आचार्य दीपक शर्मा द्वारा व्यक्त किया गया ।

वहीं सुशीला देवी आदर्श विद्या मंदिर छीपाबड़ोद में भी प्रातः कालीन वंदना सभा में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की जयंती बड़े हर्षोल्लास से मनाई गई। उत्सव जयंती प्रमुख अंजलि प्रजापति ने जानकारी देते हुए बताया कि कार्यक्रम मे रानी लक्ष्मीबाई की सजीव झांकी सजाई गई। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता व अध्यक्ष के रूप में जगदीश सिंह (एडवोकेट,पूर्व अध्यक्ष अभिभाषक परिषद, गौसेवक एवं सामाजिक कार्यकर्ता, पछाड़) उपस्थित रहे ।प्रधानाचार्य जोधराज नागर ने अतिथि का परिचय करवाया एवं स्वागत मेघराज नागर ने किया । अपने उद्बोधन में मुख्य अतिथि ने बताया की लक्ष्मीबाई का जन्म सन 1828 में मृत्यु सन 1858 [ 29 वर्ष ]
पिता मोरोपंत ताम्बे माता भागीरथी बाई पति झाँसी नरेश महाराज गंगाधर रावनेवलेकर
संतान दामोदर राव, आनंद राव [ दत्तक पुत्र ] घराना मराठा साम्राज्य था। उन्होंने आगे बताया कि रानी के जीवन में अनेक विशेषताएँ थी, जैसे :
नियमित योगाभ्यास करना,धार्मिक कार्यों में रूचि,सैन्य कार्यों में रूचि एवं निपुणता,उन्हें घोड़ो की अच्छी परख थी,रानी अपनी का प्रजा का समुचित प्रकार से ध्यान रखती थी,गुनाहगारो को उचित सजा देने की भी हिम्मत रखती थी.। इस प्रकार रानी ने अपना संपूर्ण जीवन अंग्रेजों से देश को आजाद कराने में निछावर कर दिया ।ऐसी वीरांगना रानी को हम बारंबार प्रणाम करते हैं ।कार्यक्रम का संचालन निधि वैष्णव ने किया। इस अवसर पर गिरीश कुशवाह,हर्षवर्धन सिंह ,विजय चौरसिया, संजय प्रजापति ,शिवराज गुर्जर ,गिरजेश नागर ,प्रहलाद कुमार ,चेतन नागर, निधि पारेता आदि उपस्थित रहे ।शांति मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने मनाई वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की जयंती ।

छीपाबड़ोद । सुशीला देवी आदर्श विद्या मंदिर छीपाबड़ोद में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की जयंती बड़े हर्षोल्लास से मनाई गई। उत्सव जयंती प्रमुख शिल्पा पंकज ने जानकारी देते हुए बताया कि कार्यक्रम मे रानी लक्ष्मीबाई की सजीव झांकीयां सजाई गई। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता विद्यालय के सचिव जगदीश नागर(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला संपर्क प्रमुख)के रूप में रहे । विशिष्ट अतिथि हेमराज सुमन abvp के कार्यकर्ता आनंद मीणा,योगेंद्र कुशवाहा,शिवराज गुर्जर,हेमंत मीणा,आदि का परिचय प्रभारी हेमंत नागर ने करवाया एवं स्वागत मनीष सेन रविंद्र सेन ने किया । एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के द्वारा कन्या पूजन कर।अपने उद्बोधन में मुख्य अतिथि ने बताया की लक्ष्मीबाई का जन्म सन 1828 में मृत्यु सन 1858 [ 29 वर्ष ]पिता मोरोपंत ताम्बे माता भागीरथी बाई पति झाँसी नरेश महाराज गंगाधर रावनेवलेकर संतान दामोदर राव, आनंद राव [ दत्तक पुत्र ] घराना मराठा साम्राज्य था। उन्होंने आगे बताया कि रानी के जीवन में अनेक विशेषताएँ थी, जैसे :नियमित योगाभ्यास करना,धार्मिक कार्यों मे रूचि,सैन्य कार्यों में रूचि एवं निपुणता,उन्हें घोड़ो की अच्छी परख थी,रानी अपनी का प्रजा का समुचित प्रकार से ध्यान रखती थी,गुनाहगारो को उचित सजा देने की भी हिम्मत रखती थी.। इस प्रकार रानी ने अपना संपूर्ण जीवन अंग्रेजों से देश को आजाद कराने में निछावर कर दिया ।ऐसी वीरांगना रानी को हम बारंबार प्रणाम करते हैं ।कार्यक्रम का संचालन श्री ललित कुमार नागर ने किया। इस अवसर पर विद्यालय के सभी आचार्य दीदी उपस्थित रहे । कार्यक्रम का समापन शांति मंत्र के साथ हुआ।