आज भले ही देश में शहरीकरण बढ़ता जा रहा है । लेकिन आज भी देश की अधिकतर आबादी ग्रामों में ही निवास करती है । एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कुल 6 लाख से भी अधिक ग्राम हैं, क्या आपने कभी सुना है की एक गांव ऐसा भी है जो दो देशों में बंटा हुआ है । हम बताते हैं आपको इस गांव का नाम लोंगवा हैं जो की नागालैंड में मौजूद है, लेकिन इस गांव की सबसे रोचक बात ये है कि इसका एक हिस्सा भारत में है तो दूसरा हिस्सा म्यांमार में पड़ता है. इसीलिए गांव के लोगों को दोनों देशों की नागरिकता मिली हुई है. वे बिना किसी रोक-टोक के आराम से म्यांमार में भी घूम सकते हैं ,और भारत में भी । विस्तृत जानकारी लेखक नागेंद्र सिंह से प्राप्त होती है उन्होने उनके लेेेमें लिखा है कि

आपने काफी अजब गांवों के गजब कारनामे देखे और सुने होंगे, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि भारत में एक गांव ऐसा भी है जहां खाना भारत में बनता है और सोने दूसरे देश में जाते हैं। जी हां…. आपको बता दें कि ऐसा अनोखा गांव भारत में ही है। यह गांव जितना खूबसूरत है, उतनी ही अनोखी यहां की कहानी भी है। इस गांव का नाम है लोंगवा जो कि भारत के नागालैंड में पड़ता है और म्यांमार बॉर्डर पर यह गांव पड़ता है। लोंगवा गांव को भारत देश का आखिरी गांव के नाम से भी जाना जाता है। मतलब यह गांव दो देशों के अलग-अलग हिस्सों में आधा-आधा बंटा हुआ है। यह गांव नागालैंड के मोन जिले में बसा हुआ है जो देश के आखिरी गांव के नाम से भी जाना जाता है। लोंगवा गांव का आधा हिस्सा भारत में और आधा म्यांमार में पड़ता है। इस गांव की एक और खास बात ये है कि सदियों से यहां रहने वाले लोगों के बीच दुश्मन का सिर काटने की परंपरा चल रही थी, जिस पर 1940 में प्रतिबंध लगाया गया।

लोंगवा नागालैंड के मोन जिले में घने जंगलों के बीच म्यांमार सीमा से सटा हुआ भारत का आखिरी गांव है। यहां कोंयाक आदिवासी रहते हैं। इन्हें बेहद ही खूंखार माना जाता है। अपने कबीले की सत्ता और जमीन पर कब्जे के लिए वो अक्सर पड़ोस के गांवों से लड़ाइयां किया करते थे। साल 1940 से पहले कोंयाक आदिवासी अपने कबीले और उसकी जमीन पर कब्जे के लिए वो अन्य लोगों के सिर काट देते थे। कोयांक आदिवासियों को हेड हंटर्स भी कहा जाता है। इन आदिवासियों के ज्यादातर गांव पहाड़ी की चोटी पर होते थे, ताकि वे दुश्मनों पर नजर रख सकें। हालांकि 1940 में ही हेड हंटिंग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया। माना जाता है कि 1969 के बाद हेड हंटिंग की घटना इन आदिवासियों के गांव में नहीं हुई।

गांव के मुखिया खाता भारत में और सोता म्यांमार में…..

कहा जाता है कि इस गांव को दो हिस्सों में कैसे बांटा जाए, इस सवाल का जवाब नहीं सूझने पर अधिकारियों ने तय किया कि सीमा रेखा गांव के बीचों-बीच से जाएगी, लेकिन कोंयाक पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। बॉर्डर के पिलर पर एक तरफ बर्मीज में (म्यांमार की भाषा) और दूसरी तरफ हिंदी में संदेश लिखा हुआ है। कोयांक आदिवासियों में मुखिया प्रथा चलती है। यह मुखिया कई गांवों का प्रमुख होता है। इस गांव के मुखिया का नागालैंड के अलावा अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सहित 70 से अधिक गांव में पूरा प्रभूत्व बना हुआ है। उन्हें एक से ज्यादा पत्नियां रखने की छूट है। फिलहाल जो यहां का मुखिया है, उसकी 60 बीवियां हैं। भारत और म्यांमार की सीमा इस गांव के मुखिया के घर के बीच से होकर निकलती है। इसलिए कहा जाता है कि यहां का मुखिया खाना भारत में खाता है और सोता म्यांमार में है। इस गांव के लोगों को भारत और म्यांमार दोनों देशों की नागरिकता मिली हुई है। वो बिना पासपोर्ट-वीजा के दोनों देशों की यात्रा कर सकते हैं।